अखाड़े में बुलडोज़र – मुंबई के परिपक्त झुग्गीवासी – प्रियंका बोर्पुजारी

अखाड़े में बुलडोज़र – मुंबई के परिपक्त झुग्गीवासी
– प्रियंका बोर्पुजारी

कुछ साल पहले, कफ परेड के अम्बेडकर नगर में रहने वाले अहमद शेख का टीन से बना घर तोड़ दिया गया, जबकि बाकी पक्के घरों को छुआ तक नहीं गया | अहमद शैख़ ने इशारे को समझा और झट से सीमेंट की छत बना ली और व्यर्थ पड़े टाइल्स से दीवारों को सजा दिया | इस साल 3 मई को शैख़ का घर और अन्य 1500 घरों के साथ धूल में मिला दीया गया | यह लगभग चार दिन के तोड़ू अभियान के अंतर्गत हुआ जिसका उद्देशय था कि मैन्ग्रोव के पेड़ों के क्षेत्र पर से कब्ज़ा हटाना |
संतोष राउत अप्रैल तक टैक्सी चलाता था | उसने बचत करके अपने घर में तीन लाख रूपए लगा करके एक परछती बनवाई ताकि उसके निचले माले पर वह एक किराने की दूकान खोल सकें | 1 मई को उसने पूजा करके दूकान का उद्घाटन किया | अगले ही दिन किराना स्टोर और घर दोनो तोड़ दिए गए | “अब मेरे पास ना काम है, ना घर और ना दुकान | अब एक व्यक्ति आखिर ज़िन्दगी कैसे बिताये?”

अम्बेडकर नगर में अब एक तबाही का मंज़र नज़र आता है | जो पहले एक बस्ती हुआ करती थी अब एक खाली और बदनाम आदर्श सोसाइटी और समुन्दर के पार की ऊँची इमारतों के बीच दबा हुआ वीरान ज़मीन का टुकड़ा है | पानी और मलबे के बीच में मैन्ग्रोव के पेड़ों का क्षेत्र है जिसे बॉम्बे उच्च न्यायालय के 2005 के आर्डर से भारतीय वन कानून, 1927 के तहत संरक्षित वन घोषित कर दिया गया है |

इसी दौरान और पाँच सौ घर मालवणी और चारकोप में तोड़े गए | यह तोड़ू कार्यवाही भी मैन्ग्रोव के पेड़ बचाने के लिए हुई पर वहीँ दूसरी ओर केंद्रीय पर्यावरण विभाग ने मुंबई मेट्रो रेल कारपोरेशन को मेट्रो का फेज-थ्री बनाने के लिए 1000 मैन्ग्रोव के पेड़ काटने की अनुमति दी |

घरों के अधिकारों का संघर्ष, वैध घर दिलाने का प्रयास और कब्ज़े पे रोक-थाम लगाने की कोशिश 1900 से शहर को अलग-अलग दिशाओं में खीच रही है | झोपड़पट्टी में रहने वाले दावा करते है कि उनके घर वर्ष 2000 के पहले से है –ऐसा होने पर उनके घर टूटने से बच जाते हैं – मगर अधिकारी कहते हैं उनका दावा झूठा है | इसका परिणाम: या तो उनकी ज़िन्दगी में लगातार उथलपुथल रहेगी या बुलडोज़र के नीचे कुचल दिए जायेंगे या तो फिर बेदिली से हुए पुनर्वास योजना में फंस जायेंगे नही तो नेता-बिल्डर के गठजोड़ में पिस जायेंगे |

“शहर को कम दाम में काम करने के लिए झुग्गीवासियों की ज़रुरत है, मगर राज्य, बाज़ार और समाज उनके अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं हैं | यह एक असफलता है कि उन्हें इतने अच्छे वेतन नहीं दिए जाते जिससे वह अपने लिए एक अच्छा घर खरीद सकें,” अमिता भिड़े, टाटा सामाजिक विज्ञानं संसथान के सेंटर फॉर अर्बन प्लानिंग, पॉलिसी व गवर्नेंन्स की अध्यक्ष हैं |

लौगों के पहले मैन्ग्रोव

किसी भी ज़मीन के टुकड़े को वन की ज़मीन घोषित तभी किया जा सकता है जब ‘फारेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर’ उस ज़मीन पर बसे लोगों के अधिकारों के सम्बन्ध में समाधान निकाल ले |
छेड़ानगर और चारकोप में मैन्ग्रोव के पेड़ों के क्षेत्र में पड़ने वाली झुग्गियों को ‘फारेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर’ के बिना जाँच पड़ताल किये ‘मैन्ग्रोव सेल’ ने सारे घर तोड़ दिए |

महाराष्ट्र के प्रधान मुख्य वन रक्षक और मैन्ग्रोव सेल के हेड, एन. वासुदेवन, का कहना हैं कि, ‘फारेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर’ राजस्व विभाग से हैं, वन विभाग से नही | फारेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर द्वारा अधिकारों का समाधान करने का काम और अधिसूचित वन ज़मीन से कब्ज़ा हटाने का काम दो अलग-अलग प्रिक्रियें है | हम वन अधिसूचित ज़मीन पर गैरकानूनी कब्ज़ा करने को अधिकार नही कह सकते और हम झोपड़पट्टियों को मैन्ग्रोव की ज़मीनों पर डेरा नही डालने दे सकते |’

महाराष्ट्र राज्य सरकार ने 2014 में घोषित किया था कि 2000 के पहले से बनी हुई झोपड़पट्टीयां नियमित मानी जायेंगी, जिससे उनकी जगह का विकास होगा और उन्हें एस. आर. ऐ. की ओर से मुफ्त में 225 स्क्वेर फीट के अपार्टमेंट दिए जायेंगे | इसी बात को मद्देनज़र रखते हुए अम्बेडकर नगर के झोपड़पट्टी के निवासी कहते हैं के वह वर्ष 2000 के पहले से वहां रहते है | वर्ष 2013 में अम्बेडकर नगर में भीषण आग लगी थी जिसमे उनके सारे दस्तावेज़ जल गए थे और यही कारण है कि वह वर्ष 2000 के पहले के दस्तावेज़ नहीं दिखा सकते जिस कारण वह न्याय और पुनर्वास से वंचित हो गए है |

एन. वासुदेवन निवासियों के दावे को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि, ‘2005 के सेटेलाईट तस्वीरों के द्वारा चित्र में हरी ज़मीन देख कर मैन्ग्रोव को वन की ज़मीन घोषित किया जाता है | जो भी उन जगहों पर 2005 के पहले से रहना का दावा कर रहें हैं वह साफ़ झूट बोल रहे हैं |”

(दोबारा) घर बनाने की ज़रुरत

बिलाल खान, घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन के एक कार्यकर्ता हैं जो घर के अधिकारों की वकालत करते हैं, उनका कहना है कि ‘कब्जाधारी’ शब्द का इस्तेमाल करना उन लोगों के साथ नाइंसाफी है जो मुंबई में घर खरीदने की क्षमता नहीं रखते | “अगर ‘असंगठित मज़दूर सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 को राज्य के स्तर पर लागू किया जाए, तो लोगों के श्रम को मान्यता प्राप्त होगी और उन्हें आवास, पेंशन, इन्शौरेंस, और अंतिम संस्कार में सहायता के सहित सात योजनाओं का लाभ मिलेगा | प्रचलित सस्ती आवास योजना के तहत आज सस्ते घरों की कीमत 10 लाख रूपए के ऊपर है | एक सफाई कर्मचारी जो मुंबई महानगर पालिका का कर्मचारी नही है वो कैसे इस प्रकार के सस्ते घर खरीद पायेगा ?”

आज़ादी से पहले, मजदूरों को आवास प्रदान करने की ज़रुरत को मान्यता थी | इसीलिए बी.डी.डी. चाल, मोहम्मद अली रोड पर इमामबाड़ा और भय्कल्ला और ताड़देव में बीआयटी चाल बनाये गए; इन चालों के अन्दर टेक्सटाइल मिल मजदूरों को घर प्रदान किये जाते थे |

आजादी के बाद मजदूरों को घर की ज़रुरत को ज़्यादातर नज़रंदाज़ कर दिया गया है | माहडा ने 1970 के दशक में कुछ सस्ते घर ज़रूर बनाये मगर वो मांग की बढ़ती हुई रफ़्तार से बहुत धीरे पड़ गये | तो खाली ज़मीन पर अस्थायी घर बनने लगे जो धीरे धीरे झोपड़पट्टी में तबदील हो गए | बिल्डर खाली ज़मीन पर मजदूरों को दो –तीन साल के लिए अस्थायी घर बनाने की इजाज़त देता और वो भी झोपड़पट्टी में बदल जाते |

वरिष्ठ पत्रकार और ‘रीडिसकवरिंग धारावी: स्टोरीज फ्रॉम एशियाज़ लार्जेस्ट स्लम ‘ की लेखिका, कल्पना शर्मा, कहती हैं कि कुछ झोपड़पत्तियाँ उन्नयन के लिए योग्य थी | “1970 के दशक तक कई झुग्गियां को अवैध और अनियमित समझा जाता था, तो जब भी शहर को जगह की ज़रुरत होती थी झोपड़पट्टियों को उजाड़ दिया जाता था | एक झुग्गीवाले के पास पर्याय घर पाने के लिए कोई अधिकार नही था | एक आगामी झोपड़पट्टी उन्नयन योजना के तहत मान्यता प्राप्त झुग्गीवासियों को मुंबई महानगर पालिका, राज्य सरकार या केंद्रीय सरकार की ज़मीन पर घर बनाने की अनुमति दी गयी और सबको फोटो पास दिए गए |’

यह झोपड़पट्टी उन्नयन योजना 1995 तक चली ; इसके बाद भाजपा-शिव सेना की गठबंधन वाली सरकार ने एस.आर.ए को लाया | दिनेश अफ्ज़ल्पुकर समिति ने सिफारिशों के अनुसार क्षैतिज झोपड़पट्टीयों को खड़े ढांचों में तबदील किया गया जिससे व्यवसायिक निर्माण करने की जगह खुले | यह योजना कागज़ पर तो काफी अच्छा विचार लगा, मगर, श्रीमती शर्मा का कहना है कि असल में योजना कारगर साबित नही हुई क्योंकि बिल्डर्स उसी प्लाट पर पुनर्वास योजना में रूचि दिखाते जिसकी बाज़ार में हाई रियल एस्टेट वैल्यू होती | धारावी पुनर्विकास योजना, जिसको पाँच भागों में बांटा गया था, गलत जनगणना होने से अड़चन में फस गयी |

जोगेशवरी में झुग्गियां 1960 के स्लम एक्ट के पहले से बनी हैं पर जो विकास अराखाड़ा 1964 में जारी हुआ उसमे इन झुग्गियों को दर्शाया ही नही गया | प्रोफेसर भिड़े कहती हैं कि “इन झुग्गियों को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया और जहाँ पर झुग्गियां थी वहाँ पर विकास अराखाड़ा में सड़क दर्शाई गयी | यह विवाद शहर के ढाँचे में तबदील हैं |’

राजनैतिक गठबंधन
ज़मीन और आधारिक संरचना को व्यापारिक वस्तु बनाने की होड़ ने रियल एस्टेट में कीमतें आसमान छूने लगी है , इस प्रिक्रिया ने एक पैटर्न पैदा किया है जिसमे घर गरीब की पहुच से दूर होता चला जा रहा है और बाज़ारी ताकतें शहरी बदलाव के आयाम तय कर रहीं है | यही सारी बाते कई घोटालों का कारण भी बनी, जिसमे नेता-बिल्डर के गहरे गठबंधनों से ज़मीने बेहद सस्ते दामों में लूटी गयी हैं | वसई-विरार ग्रीन बेल्ट को 1990 के दशक में हजारों एकड़ ज़मीन आवास के लिए मुक्त की गयी है |

31 माले की आदर्श हाउसिंग सोसाइटी, जिसके पीछे अम्बेडकर नगर पड़ता है, कारगिल के युद्ध की विधवाओं के लिए बनाई गयी थी | ऊंचे पद के सरकारी अधिकारीयों ने ज़मीन स्वामित्व के नियमों का खुला उलंघन करते हुए अपने नाम पर बाज़ार की कीमतों से कहीं नीचे दामों पर फ्लैट अपने नाम करा लिए | इस घोटाले के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चौहान को 2010 में इस्तीफा देना पड़ा था |

पश्चिमी तीव्रगामी सड़क से लगे गोलीबार में 125 एकड़ के प्लाट पर शिवालिक वेंचर्स द्वारा चलाई जा रही झोपडपट्टी पुनर्वास योजना में झोपडपट्टी वासियों के संघर्ष की कहानी लम्बी है | गोलीबार के निवासी कृष्णा नायर बताते है कि इस प्लाट पर बने घरों को 2004 में तोडना शुरू किया | कृष्णा का कहना है अब तक तोड़े हुए 7,666 घरों के एवज़ में आजतक केवल 1,932 लोगों को ही नया घर मिला है | घर के बदले घर मिलने वाली इस योजना के लाभकारी लोग सालों से ट्रांजिट कैम्पस में रह रहे है | यह ट्रांजिट कैम्पस गोलीबार के एक हिस्से में बने हुए है जो आज एक खस्ता हालत में है और कभी भी गिर सकते है | दरअसल ट्रांजिट कैम्पस सिमित समय के लिए ही बनाए जाते है क्योंकि लोगों को वहां अस्थायी रूप से बिल्डर के द्वारा निवारा मुहय्या कराया जाता है जबतक उनका स्थायी घर निश्चित की गयी समय सीमा में तैयार नही हो जाता | शिव सेना की कामगार यूनियन से जुड़े कृष्णा का कहना है कि वह पुनर्विकास की योजना के बारे में सुनकर बहुत खुश हुए थे | “बेहतर ज़िन्दगी किसको नही चाहिए होती है? हमे नए फ्लैट और कुछ पैसे देने का वायदा किया गया था | यह घर अगर ऊंची इमारतों में बनाये गए तो शिवालिक वेंचर्स के ¬¬¬पास फिर भी काफी ज़मीन बचेगी जिसको वह व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल कर सकता है क्योंकि यह एक प्राइम प्रॉपर्टी है |

गोलीबार की गणेश कृपा सोसाइटी ने शिवालिक वेंचर्स के खिलाफ दोखेबाज़ी का केस दर्ज करवाया क्योंकि बिल्डर ने झूट-मूठ की सहमती गढ़ के एस.आर.ए. से अनुमति प्राप्त की | कृष्णा एक के बाद एक योजना में हुए फर्जीवाड़े की कहानी सुनाते चले जाते हैं |

आवासीय संपत्ति
एस.आर.ए. के फ्लाटों की री-सेल अधिकारियों के लिए फ़िक्र का कारण बन गया है | बॉम्बे उच्च न्यायालय के आदेश पर एस.आर.ए. ने कुछ 90,000 घरों का सर्वेक्षण किया, उनमे से 12,000 गैरकानूनी सौदों में बेच दिए गए थे | नियम इस प्रकार है कि एस.आर.ए. का फ्लैट दस साल तक ना तो बेचा जा सकता और ना ही भाड़े पर दिया जा सकता है | “सर्वेक्षकों ने बस इस बिंदु पर ध्यान दिया कि घरों में रहने वाले वहीं लोग है जिन्हें एस.आर.ए. से घर मिला था या नही | उन्होंने इस बात पर ध्यान नही दिया कि किन परिस्तिथियों में खरीदी बिक्री के सौदे हुए |” यह कहना है एस.आर.ए. के पश्चिमी उपनगर के डिप्टी कलेक्टर, अजिंक्य पड़वल का |
मगर श्रीमती शर्मा कहती हैं कि यह बहुत स्वाभाविक है कि कोई भी व्यक्ति अप्ताकालीन स्तिथि में, जैसे कि बिमारी का खर्चा सहने के लिए अपनी सम्पति का इस्तेमाल करे | “अगर एस.आर.ए. फ्लैट किसी महंगे क्षेत्र में है तो यह ज़ाहिर है की लोग फ्लैट को भाड़े पर दे कर उत्तर की ओर जायेंगे |’

एस.आर.ए. का अस्तित्व इस बात पर प्रकाश डालता है कि झुग्गीवासी एक खाली बंजर ज़मीन पर रहकर उसका मूल्य बढ़ाते हैं, जैसे धारावी में दिखता है जो पहले एक दलदल ज़मीन थी | मगर एस.आर.ए. के द्वारा पुनर्निवास के प्रयासों में झुग्गीवासियों का रोज़गार और सामाजिक संबंध ही ज्यादा भंग हुए हैं |

मुंबई महानगर पालिका के आतिक्रमण निष्कासन सेल के सहाय्यक आयुक्त, विश्वास शंकरवर कहते हैं कि लोग मानखुर्द जैसी जगहों पर एस.आर.ए. का फ्लैट लेने में हिचकिचाते हैं | “जब लोग दादर जैसी अछी जगहों पर रह रहे होते हैं तो ज़मीन की ऊँची कीमत के कारण उसे छोड़ना नहीं चाहते|”

कानून से समाधान ?
घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन के श्री. खान कहते हैं कि बुलडोज़र के सामने खड़ा होना और कोर्ट कचहेरी के चक्कर काटना तो बस आग को कुछ देर के लिए बुझाने जैसा है, इससे कोई हल नही निकलने वाला |

पर्याप्त आवास के अधिकार पर संयुक राष्ट्र की विशेष रिपोर्टर, सुश्री लेलानी फराह ने वर्ष 2016 में मानव अधिकारों पर आधारित भारत में घर के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय कानून की मांग करी | सुश्री फराह द्वारा पेश की गयी रिपोर्ट की मुख्य सिफारिश यह थी कि आवासीय अधिकारों के सवालों को सुलझाने के लिए एक राष्ट्रीय कानून बने |

2002 में घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन ने एक के बाद एक तोड़ू कार्यवाही को देखकर एक केस फाइल किया जिसके जवाब में सरकार ने एक टास्क फाॅर्स का गठन किया जिसका कार्य था कि वह 1995 के बाद आयीं झुग्गी-झोपड़ियों के बारे में जाने | प्रोफेसर भिड़े उस टास्क फ़ोर्स में शामिल थी और उनकी अनेक सिफरिशों में से एक सिफारिश यह थी कि कट-ऑफ-डेट की धारणा को ख़ारिज कर देना चाहिए |

टास्क फ़ोर्स की अंतिम रिपोर्ट को सरकारी मंज़ूरी मिलने से पहले ही 2006 में एक नयी आवासीय नीति की स्थापना कर दी गयी | अभी चलन में जो तरीका है जिसमे मुफ्त आवास दिए जा रहे हैं, उससे एक उपरी सीमा बन जाती है जिससे तय होता है कि कितने घर कितने और कैसे लोगों को मिलेंगे | प्रोफेसर भिड़े कहती हैं कि ऐसी नीति अपवर्जनात्मक है, जिससे सिर्फ निवेशकों को फायदा होता है और फलस्वरूप दूर दराज़ की जगहों पर नई बस्तियां वजूद में आती है | ऐसी कई बस्तिया ऐरोली, भयंदर और नाल्लासोपारा में बन रही है | “ऐसा लगता है जैसे शहर अपने दरवाज़े बंद कर रहा है जो एक विडंबना है क्योंकि हम प्रवासियों को तो आकर्षित करना चाहते है पर गरीबों को नहीं |”

क्या मुंबई ने अब आवासीय अधिकार देने का मौका छोड़ दिया है ? क्या गरीबों के घरों का टूटना जारी रहेगा ?

प्रोफेसर भिड़े कानूनी और गैरकानूनी की धारणाओं से आगे बढ़ने को सुझाती हैं | “सस्ते आवास प्राप्त करने का दायरा बढ़ाना चाहिए | गरीब पैसा देने के लिए तैयार हैं पर वो कानूनी रास्ते ही कहाँ हैं जिससे गरीब आपनी मामूली सी आमदनी से घर खरीद सके ?”

मुंबई के एम-ईस्ट वार्ड में बन रहीं नई झोपड़ियों को देखकर ऐसा व्यतीत होता है कि गरीब जनता दो-तीन पुश्तों तक झुग्गी की दुनिया से बहार ही नही निकल पायेगी |

इस दौरान अम्बेडकर नगर में तिरपाल से बने अस्थाई टेंट बन गए हैं; कुछ पुराने रहिवाशी कहीं और कमरा भाड़े पर ले कर रह रहे हैं | श्री खान ने पूछते है कि वहाँ पर “एक औरत की महीने की आमदनी सिर्फ 2000 रूपए है,उसके लिए सस्ता घर कहाँ मिलेगा ?”

प्रोफेसर भिड़े कहती हैं कि और गहरे अनुबंध की ज़रुरत है | ‘हम कानून के आधार पर बात कर सकते हैं मगर उससे सव कुछ न्यायसंगत नहीं हो जाता | न्याय के और भी तरीके होना चाहिए |”

यह आर्टिकल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद हुआ है | असली आर्टिकल के लिए इस लिंक पर जाये: http://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/bulldozer-in-the-ring/article19099978.ece

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If buildings can be regularized, why not slums?

If buildings can be regularized, why not slums?

Slum dwellers live in constant fear of eviction, why not some relief for them?

Mumbai | 12th March, 2016: The Maharashtra government’s decision to regularize 2 lakh illegal buildings in the urban areas of the state without mentioning slums has again shown its apathetic attitude towards its poor citizens. Large number of slum dwellers living in Mumbai without documentary proof that they have been lived there before the year 2000, live under constant threat of eviction. The Maharashtra government has set 1-1-2000 as the cut-off-date for the protection of slum dwellers and made provisions to rehabilitate those who fall within this time-frame. This divides slums into two categories: those that are protected and those that are not. The government authorities can evict any slum dweller who does not have documentary proof to prove her/his dwelling existed pre-2000,  using the argument that he/she is in ‘illegal’ possession of house as well as land and is an ‘encroacher’. Many of the slum dwellers have lost their documents during the demolition process itself which compel them to shift from one place to another within the city, hence they fails to maintain right documents even if they have born in Mumbai.

Slum dwellers are the victims of wrong perspectives developed about them. Nobody lives in a slum willfully. Nobody would like to stand in long queues outside the public toilets in the morning to wait their turn for a chance to use the lavatory. Most of the time, in the absence of public toilets, slum dwellers (women included) are compelled defecate in the open, which puts their health and safety at risk every day. All this continues despite the newly adopted ‘Swachch Bharat Mission’. In the absence of water supply from the Municipal Corporation, a family living in a slum spends at least Rs. 1500-2000 per month on buying water. This cost consumes a very major portion of their monthly income. The network of slum mafia and dalals in nexus with local politicians, police and government authorities is so strong in a slum that it is difficult for a poor person living there to escape the exploitation by this network. Slum dwellers are looted in the name of each service they are getting in their slums, especially water and electricity. Because of this filthy network, the whole slum community is treated as a colony of mafia and goons. However, one fails to acknowledge the service these slums provide in the form of domestic help, construction workers, municipal sweepers, auto and taxi drivers, fruit and vegetable vendors, milkmen, skilled and unskilled workers, informal laborers, security guards and so on. A middle or upper class person requires the services of several slum dwellers in different forms throughout the day. So, is it not just to give slum dwellers their due space and right in the city? How can the whole slum community be branded criminal because of a few black sheep living there? If this judgment is applied to slums, the same principle should be used to cover the middle and elite classes as well – the rest of the city would then be given the same treatment

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​                                                A slum in Govandi, Mumbai

 

After the recent outbreak of fire at the Deonar dumping ground in Mumbai, the communities in surrounding slums immediately bore the brunt of the negative effects. They stay closest to the toxic fumes, breathing in the worst of the polluted air. The homes of 470 slum families were demolished with the argument that the BMC needed to construct a wider road to allow the fire brigade to reach the dumping ground faster in case of similar fires in the future. Later it was discovered that the Municipal Corporation is planning to make a garden in the demolished area! The demolished area is reserved for Housing in the city’s Development Plan, whereas space for a recreational ground is reserved next to it.  So the civic authorities are planning to replace people’s homes with gardens. If there are so many gardens, where will people live? When the BMC, who demolished this slum, was asked about the alternate accommodation for the evicted community, they refused to lift a finger to help them since this settlement is post-2000 – after the protective cut-off-date. Effectively they are saying that if a person cannot afford to buy a house or live in a rented house in as expensive a city as Mumbai, she/he has no right to live here if they do not have documentary proof of being in their home pre-1-1-2000. This situation violates article 21 of the Constitution of India that guarantees right to life – also interpreted as including the right to shelter.  To make matters worse, Mumbai is also the worst in providing night shelters in the city. At least one night shelter should be there for every one lakh population as per the norms set by NULM. At present only 9 shelters have been built in the city, however, as per the norms set by NULM , 125 night shelters are required in the city. But the authorities do not seem to be ready to grant space for homeless persons. In the present Development Plan of the city, reservation is made for only 48 night shelters and that too for homeless children but not for old persons, women and differently able persons.

Our country’s Prime Minister,  Shri Narendra  Modi has launched the“Housing For All by 2022 Mission’’. Before it is realized, the BJP-led Maharashtra government has nothing to offer in terms of housing to post-2000 slums, except to label them ‘encroachments’. This is in contradiction with the party’s claims in the Centre. As is demonstrated here, critical analysis of this Mission tells a different story altogether. The Government of Maharashtra must treat all its citizens at par whether rich or poor.  There should be equal laws for all and efforts must be made to reduce inequality among different section of the society. A large section of serving citizens living in Mumbai’s slums, must be considered by Maharashtra government as well.

 

Medha Patkar                        Bilal Khan                 Uday Mohite                         Anwari Shaikh

Poonam Kannaujiya                        Jaimati           Jainuddin Ansari      Subhadra Kedare

Contact: +91 9958660556 | gbgbandolan@gmail.com | https://twitter.com/gbgbandolan | https://www.facebook.com/GBGBandolan/

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Not Waste Pickers, This Is Who’s Responsible For The Fire At Mumbai’s Dumping Ground

By Bilal Khan

Slum children walk through a dried-up creek covered with wasted rubber sheets in Mumbai November 23, 2009. More than a third of India's population survives on less than one dollar a day, according to a 2007 United Nations report. REUTERS/Arko Datta (INDIA ENVIRONMENT SOCIETY IMAGES OF THE DAY) - RTXR1HE
Image source: REUTERS/Arko Datta

The recent outbreak of fire at the Deonar dumping ground in Mumbai has reignited the discourse around waste management system in the country. The unanimous demand from the elite citizens of the city is to shut down the dumping ground and replace it with a scientific waste management system. However, in the deliberations and coverage by the media after the fire outbreak around the issues related to waste management, nobody seems to have shown concern about the loss of livelihood of the waste pickers that find employment there, in case it is dismantled. It is only these waste pickers who were helping in the segregation of waste and facilitating the recycling of the dry waste until now in the absence of any decentralized waste management system. They have an important role in the recycling of the waste generated in the city. But the work done by these waste pickers and their contribution is not being recognized by the Municipal Corporation even after directions from the Central Government.

This is not to say that the waste pickers should remain engaged in the same activity that poses great risk to their health and well-being. The more appropriate approach would be to come up with an alternative plan in which the waste be managed scientifically by including the labour of these waste pickers in a healthy and productive atmosphere so that the livelihood of this community remains ensured.

As far as the reason for the outbreak of fire at Deonar is concerned, the blame cannot be entirely put on the waste pickers because they are the least likely to be the cause of fire. In fact, the presence of high level of inflammable methane gas becomes the cause of frequent fire on the dumping ground. The methane is spontaneously produced in large quantities as a result of decomposition of organic waste. Even a careless cigarette butt could provoke a fire.

This would not be the case if the rule laid down by Ministry of Environment and Forest in the year 2000 which states that “land filling shall be restricted to non-biodegradable, inert waste and other waste that are not suitable either for recycling or for biological processing,” was followed. But it has been observed that the uncontrolled dumping of the unsegregated waste is increasing by the day poses a multitude of risks to the environment and the people living around it. It is the one of the foremost responsibilities of the state government to manage and treat the waste generated in the city and prevent it from becoming an overwhelming cause of pollution and risk to health and life of the citizens. The current manner in which the BMC is handling the waste generated in the city is extremely inefficient and disastrous to the ecological system of Mumbai. In such a situation how sensible is it to blame the waste pickers for the fire accident when they are the ones that are to be worst affected in the case of a fire?

In such a risk-prone environment, it is imperative to have a functional and efficient disaster management system. According to Schedule III, rule number 15 of the Municipal Solid Wastes (Management and Handling) Rules, 2000, “Provisions like weigh bridge to measure quantity of waste brought at landfill site, fire protection equipments and other facilities as may be required shall be provided.” If any disaster management system is available at the Deonar dumping ground, it is inefficient or defunct. As soon as nearby residents expressed anger over the disaster management system, the Chief Minister of Maharashtra, Devendra Fadnavis, had announced that CCTV cameras would be installed in the dumping ground, which would apparently help in preventing the fire. A functional fire management system is the foremost need at the dumping ground, which can be aided and made more efficient with the help of CCTV cameras.

The biggest question is, who is responsible for the damage caused, particularly to the quality of the air, with this outbreak of fire at the dumping ground? Is it the responsibility of those three children that the Divisional Fire Officer’s report has accused of causing the fire? It is possible that they may have been accidentally involved in an activity that escalated quickly into a huge fire in an environment extremely combustible in nature. But this disaster was entirely preventable, had the BMC been following all the rules and regulations regarding the management of waste and disaster management. A fair enquiry as to the cause of the fire and the elements that led to its high intensity and impact is required, focusing on finding out whether all the rules were being followed within the management to check the situation in the wake of any tragedy.

Assisted by Priyanka Iyengar- social work student at Nirmala Niketan, Mumbai.

Source: http://www.youthkiawaaz.com/2016/02/mumbai-dumping-ground-fire/

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‘Officials flouting HC order while evicting slum dwellers’

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Activists say administration not adhering to cut-off date set by the court

 

The Maharashtra Forest department’s mangrove cell has been implementing the High Court’s order of clearing mangrove areas of encroachments. However, housing activists claim that slum dwellers protected by the cut-off date of January 1, 2000, are also facing the brunt.

The Bombay High Court in 2005 had ordered that “regardless of ownership of the land, all construction taking place within 50 metres on all sides of all mangroves shall be forthwith stopped”.

“When the authorities demolish, they do not consider the cut off of January 1, 2000, set by the Maharashtra Government Resolution dated July 2, 2014,” said Bilal Khan of the Ghar Bachao Ghar Banao Andolan. “Instead of removing encroachments post-2005, the officials demolish the entire slum.”

While officials claim adherence to procedures, there appears to be a mismatch between the settlements reflected in satellite mapping and the situation on the ground. The mangrove cell relies on maps prepared through a satellite study by the Maharashtra Remote Sensing Application Centre, specifying mangrove areas in the year 2005.

According to the organisation, in the case of Malvani in Malad, “The staff had come down to demolish the shanties in the notified regions as specified in the maps, but they demolished the whole slum. An official said one cannot distinguish between the old and the new houses or those lying perfectly on the boundaries of the forest and outside.”

Refuting the claims of slum dwellers, officials said the claims were not supported by any documentary evidence. “They have documents of one location, based on which they stake claim on another location,” Mumbai suburban collector Shekhar Channe told The Hindu . “That cannot happen. We have asked our officials to verify the claims. When an area under mangroves was notified in 2005, it means it had mangroves on it and the slums came later.”

N Vasudevan, chief conservator of Forests Mangrove Cell, Mumbai, told The Hindu , “Most claims are not correct. Some exceptions could be there. Many claim occupancy. These are survival tactics.” He said around 2,500 demolitions were carried out from the end of 2014 and throughout 2015.

The High Court order states that government-owned lands under mangroves should be notified as ‘protected areas’. However, Mr Khan pointed out that the State government declared such lands as ‘reserved forests’, where “a certain amount of interference is allowed”, instead of ‘protected forests’.

“Before declaring any land as ‘reserved forests’, it is the duty of the forest settlement officer to settle the rights of the people. Before this step is complete, the mangrove cell cannot go on a demolition drive. There is a lack of coordination between departments,” Mr Khan said.

Officials say slum dwellers have papers for one location and stake claim to another

Source: http://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/news/officials-flouting-hc-order-while-evicting-slum-dwellers/article8165874.ece

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5 yrs on, BMC yet to take back prime Juhu plot from builder

  • 8 Jan 2016
  • Hindustan Times (Mumbai)
  • Laxman Singh laxman.singh@hindustantimes.com

5 yrs on, BMC yet to take back prime Juhu plot from builder

MUMBAI: A prime 4,500-squaremetre plot in Juhu’s Barfiwala lane that could fetch up to Rs600 crore if developed was declared a slum and handed over to a private developer by the BMC, which has done nothing to get the land back more than five years after it decided to do so.

Now an internal audit of the BMC has criticised the inaction on the part of the civic body, which it said appeared deliberate, and called the original deal illegal. In fact, chief minister Devendra Fadnavis himself as an opposition MLA in 2013 had sought a probe into the whole issue.

In 2010 itself, a couple of years after the deal was struck, the BMC had, following complaints, decided to take the plot back and had valued the land alone at Rs135 crore.

The plot reserved for municipal housing falls under the jurisdiction of the Andheri ward office of the BMC. It is occupied by 56 families of sweeper staff of the civic body.

The controversy dates back to 2008-09 when top civic officials allowed inclusion of this plot (survey number 207) in a slum redevelopment project involving four adjoining private plots (survey numbers 208 to 211), which had slums on them.

Plot no 207 was declared a slum in 2009 and included in t he redevelopment project under the Slum Rehabilitation Authority being undertaken by Darshan Developers. Sources said the officials involved did not take the statutory permissions from the civic improvements committee and t he general body of elected representatives.

However, after activists and some corporators raised objections, in October 2010 the BMC agreed to revoke the NoC (no-objection certificate) given for the slum redevelopment project on the plot.

However, nothing has happened so f ar other than the officials concer ned tossing the file from one civic office to another.

Pravin Satra of Darshan Developers Private Limited chose not to comment. “We have nothing to do with the project now since it is taken over by another group,” he said.

In a recent inquiry conducted by it, the civic body’s TAVO (test, audit and vigilance officer) wing, called illegal the decision to declare the municipal staff quarters a slum. In its October 2015 report, the TAVO again suggested immediate cancellation of all the permissions given for the slum project. The inquiry was conducted after a complaint by activist Sayyad Haider Imam of ‘ Ghar Bachao, Ghar Banao” organisation.

TAVO pointed that though the civic body decided to cancel the project in 2010, in the next three years no attempt was made to delete the slum tag. The proposal of cancellation was to be put up before the civic chief for taking a final decision but this was not done. There have been “deliberate” delays by the department concer ned in putting up t he proposal before t he BMC commissioner, said the TAVO report. The developer did not have the ownership of plot number 211 where the residents were to be shifted and was misleading civic body, said the report.

Asked about the delay, Assistant Municipal Commissioner, K- -west (Andheri), Parag Masurkar, said, “After TAVO’s report, I put up, in November 2015, the proposal before higher authorities for further decision. Once it is cleared by them, a letter will be sent to SRA.”

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Land for Hema’s school opens a Pandora’s Box

Land for Hema’s school opens a Pandora’s Box

MUMBAI, December 31, 2015

Actor defends allotment; address needs of homeless, say critics

Hema Malini refutes the criticism, saying that the alarm raised over the allotment is misplaced and baseless

Hema Malini refutes the criticism, saying that the alarm raised over the allotment is misplaced and baseless

Following the State government’s recent decision to allot land in Andheri’s Ambivli area to BJP MP and actor Hema Malini’s dance academy, demands for land allotments for housing the homeless and slum dwellers are growing louder.

On Wednesday, the Youth for Unity and Voluntary Action sent a letter to Chief Minister Devendra Fadnavis, Maharashtra Revenue Minister Eknath Khadse and other officials asking the government to make land available for rehabilitation of the homeless.

“In response to a petition by the Homeless Collective the Mumbai Corporation and the State cited non-availability of land to rehabilitate the homeless. In this backdrop, on December 17, the BMC approved a proposal to build a cow shelter spread over one lakh square feet in the city. On Wednesday it was widely reported that Hema Malini was given land for her academy. We request the government to show the same drive in addressing the issue of the homeless,” the organisation’s letter to Mr. Fadnavis states. Mumbai needs 574 shelters and 57,000 still sleep on the city’s pavements, they said.

Meanwhile, defending the State government’s decision, Mumbai suburban Collector Shekhar Channe said the 2000 square metre land in Ambivli allotted to Ms. Malini was reserved for her institute after a change in the development plan.

“The land was reserved for the institute. It was earlier RG (recreation ground), but in the Development Plan the plot was specifically reserved for the institute,” Mr. Channe told The Hindu .

Authorities pointed out that the move was not out of turn as Section 37 of the Maharashtra Regional and Town Planning Act made provisions for “minor modification” to the development plan.

The Natyavihar Kala Kendra Charity Trust run by Ms Malini was granted the plot 19 years after she first applied for it. However, Opposition parties reacted to the government’s move citing the tardy approach to offering land for housing slum dwellers and mill workers.

Ms. Malini refuted the criticism saying that the alarm raised over the allotment was misplaced and baseless. “This place is not for slum dwellers. It is meant for education and cultural activity. I will be maintaining a public garden and only a small portion of the plot will be for the dance academy. I applied for the land 19 years back and after so many years I got it. I deserve to have this land. It is going to be a unique and beautiful cultural centre and Mumbai is happy about it. If you leave the land just like that it will be taken over by encroachments,” she told The Hindu.

RTI activist Anil Galgali pointed out that the government ought to have issued a public notice ahead of the land allotment. “The government should have announced the move through advertisements. Successive governments have been giving away land parcels to big personalities like filmmaker Subhash Ghai for his film school and former Union Minister Rajeev Shukla, which was later taken away. It is strange to allot land to powerful people. After the Adarsh scam, former Chief Minister Prithviraj Chavan had stopped discretionary allotment of land,” Mr. Galgali said.

Despite the Congress-NCP combine raising questions, housing rights activist Atiq Ansari from the Ghar Bachao Ghar Banao Andolan said governments of all hues had scuttled the rights of slum dwellers.

“In 2004 when 80,000 slum homes were demolished in Mumbai, the Congress was in power. And since then slum dwellers are only struggling for their rights. Governments only gave assurances about bringing in a government resolution. Before going out of power, the Congress brought in the Rajiv Awaas Yojana, but nothing concrete came of it. With the BJP government, it’s ‘achche din’ only for the ministers,” he said.

Land was reserved for her institute after a change in the development plan, says Collector

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